Ghazal
सब कुछ मिल गया, मगर...
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January 1, 1970
सब कुछ मिल गया, बस एक मलाल रह गया,
जवाब तो ढूँढ लिए, पर ज़िंदा सवाल रह गया।
हम बनाते रहे ऊँचे मकान शहरों में उम्र भर,
मगर गाँव वाला वो कच्चा घर, सिर्फ ख्याल रह गया।
जिस्म को सजाने की फिक्र थी सारी ज़िंदगी,
रूह कैसी है अंदर? बस यही पूछना मुहाल रह गया।
दौड़ते रहे हम घड़ी की सुइयों के साथ-साथ,
वक़्त तो बहुत था, मगर कमबख्त साल रह गया।
किस्से तो बहुत मशहूर हुए हमारी कामयाबी के,
पर जो दिल का दर्द था, वो 'बे-मिसाल' रह गया।
जवाब तो ढूँढ लिए, पर ज़िंदा सवाल रह गया।
हम बनाते रहे ऊँचे मकान शहरों में उम्र भर,
मगर गाँव वाला वो कच्चा घर, सिर्फ ख्याल रह गया।
जिस्म को सजाने की फिक्र थी सारी ज़िंदगी,
रूह कैसी है अंदर? बस यही पूछना मुहाल रह गया।
दौड़ते रहे हम घड़ी की सुइयों के साथ-साथ,
वक़्त तो बहुत था, मगर कमबख्त साल रह गया।
किस्से तो बहुत मशहूर हुए हमारी कामयाबी के,
पर जो दिल का दर्द था, वो 'बे-मिसाल' रह गया।
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