Ghazal

सन्नाटा

15 views December 12, 2025
जहाँ पे रूह भटकती हैं, वो ठिकाना है मेरा,
ये क़ब्रिस्तान ही असली अफ़साना है मेरा।

तुम्हें है ख़ौफ़ अँधेरे का, और सन्नाटे का डर,
इन्हीं से तो पुराना इक दोस्ताना है मेरा।

जहाँ पे जिस्म सड़ते हैं, जहाँ कफ़न हैं पड़े,
वहीं पे रोज़ का आना और जाना है मेरा।

वो खोपड़ी जिसे तुम देख कर के डर जाओ,
उसी को हाथ में लेना मज़ाक पुराना है मेरा।

ज़माने वालों, मुझे तुम से क्या है अब लेना,
ये मुर्दे, भूत, प्रेत... यही ज़माना है मेरा।

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