Ghazal
यानी... तुम अब भी?
12 views
December 12, 2025
अब मेरा हाल पूछने आए हो? कमाल करते हो!
मैंने तो सब भुला दिया, तुम क्यों मलाल करते हो?
वो जो एक शख़्स था, वो कब का मर गया मुझ में,
तुम अब क़ब्र पर आकर, क्यों आँखें लाल करते हो?
छोड़ो... जाने दो... ये पुरानी बातें हैं...
यानी, अब भी तुम वफ़ा की, झूठी मिसाल बनते हो?
हमने तो अपनी पूरी ज़िंदगी, मज़ाक़ में गुज़ार दी,
और एक तुम हो, जो हर बात पे सवाल करते हो।
अजीब पागलपन है, राख को कुरेदने का तुम्हें...
सब जल गया, अब राख में क्या तलाश करते हो?
अब मेरा हाल पूछने आए हो? कमाल करते हो!
मैंने तो सब भुला दिया, तुम क्यों मलाल करते हो?
वो जो एक शख़्स था, वो कब का मर गया मुझ में,
तुम अब क़ब्र पर आकर, क्यों आँखें लाल करते हो?
छोड़ो... जाने दो... ये पुरानी बातें हैं...
यानी, अब भी तुम वफ़ा की, झूठी मिसाल बनते हो?
हमने तो अपनी पूरी ज़िंदगी, मज़ाक़ में गुज़ार दी,
और एक तुम हो, जो हर बात पे सवाल करते हो।
अजीब पागलपन है, राख को कुरेदने का तुम्हें...
सब जल गया, अब राख में क्या तलाश करते हो?
अब मेरा हाल पूछने आए हो? कमाल करते हो!
Share This Poem
More from Ghazal
हुनर लफ़्ज़ों का बाज़ार में बिक सकता है बेशक,
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
लफ़्ज़ों को जोड़ना तो बस एक हुनर है दुनिया का,
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
मेरे दिल में गूँजता हुआ, एक सवाल हो तुम,
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...