Ghazal
मैं जिगर रखता हूँ
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December 12, 2025
हवाओं से लड़ने का, मैं अजब हुनर रखता हूँ,
अंधेरों में भी खुद को जलाने का, जिगर रखता हूँ।
थक कर बैठ जाना, मेरी फ़ितरत में नहीं शामिल,
मैं काँटों पे भी नंगे पाँव चलने का, सफ़र रखता हूँ।
ये शोहरत, ये बुलंदी, मुझे ख़ैरात में नहीं मिली,
गिराने वालों की साज़िशों पे भी, मैं नज़र रखता हूँ।
मेरी ख़ामोशी को मेरी 'हार' समझने की भूल मत करना,
मैं समंदर हूँ, अपने अंदर तूफ़ान का असर रखता हूँ।
ज़माना क्या मिटाएगा ज़िगर शायर की हस्ती को
मैं तो मौत से भी आगे निकल जाने की, ख़बर रखता हूँ।
अंधेरों में भी खुद को जलाने का, जिगर रखता हूँ।
थक कर बैठ जाना, मेरी फ़ितरत में नहीं शामिल,
मैं काँटों पे भी नंगे पाँव चलने का, सफ़र रखता हूँ।
ये शोहरत, ये बुलंदी, मुझे ख़ैरात में नहीं मिली,
गिराने वालों की साज़िशों पे भी, मैं नज़र रखता हूँ।
मेरी ख़ामोशी को मेरी 'हार' समझने की भूल मत करना,
मैं समंदर हूँ, अपने अंदर तूफ़ान का असर रखता हूँ।
ज़माना क्या मिटाएगा ज़िगर शायर की हस्ती को
मैं तो मौत से भी आगे निकल जाने की, ख़बर रखता हूँ।
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मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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लफ़्ज़ों को जोड़ना तो बस एक हुनर है दुनिया का,
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
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हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...
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