Nazm
मेरी प्यारी माँ
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January 1, 1970
आज फिर वही तारीख है...
वो दिन, जब मेरे सर से 'छत' और पैरों के नीचे से 'ज़मीन' एक साथ खिसक गई थी।
सब कहते हैं कि वक़्त के साथ सब ठीक हो जाता है,
पर माँ... झूठ कहते हैं वो।
वक़्त सिर्फ़ आंसू छुपाना सिखाता है, दर्द कम करना नहीं।
जानती हो माँ?
आज मैंने अपनी पसंद का खाना बनाया,
पर उसमें वो 'स्वाद' नहीं था...
शायद मसाले तो वही थे,
बस तुम्हारी हाथों की वो 'छुअन' और वो 'दुआ' कम थी।
बड़ा हो गया हूँ मैं, दुनियादारी समझता हूँ,
पर सच कहूँ?
आज भी जब कोई बात बिगड़ती है,
तो जुबान पर सबसे पहला नाम तुम्हारा ही आता है।
कमरा तो भर गया है सामानों से,
पर वो कोना आज भी खाली है, जहाँ तुम बैठकर मेरा इंतज़ार करती थी।
मुझे तुमसे एक शिकायत है माँ...
तुम तो बिन कहे मेरा हर दर्द समझ जाती थी,
फिर उस दिन... मेरे "ना जाओ" कहने पर भी तुम रुकी क्यों नहीं?
इतनी भी क्या जल्दी थी तारों में खो जाने की?
सुनो ना...
अगर हो सके, तो आज रात सपने में आना,
कुछ मत कहना... बस मेरे सर पर एक बार हाथ फेर देना।
मुझे बहुत थकन हो गई है इस दुनिया से लड़ते-लड़ते,
मुझे फिर से तुम्हारी गोद में सोना है।
सिर्फ़ तुम्हारी,
वो दिन, जब मेरे सर से 'छत' और पैरों के नीचे से 'ज़मीन' एक साथ खिसक गई थी।
सब कहते हैं कि वक़्त के साथ सब ठीक हो जाता है,
पर माँ... झूठ कहते हैं वो।
वक़्त सिर्फ़ आंसू छुपाना सिखाता है, दर्द कम करना नहीं।
जानती हो माँ?
आज मैंने अपनी पसंद का खाना बनाया,
पर उसमें वो 'स्वाद' नहीं था...
शायद मसाले तो वही थे,
बस तुम्हारी हाथों की वो 'छुअन' और वो 'दुआ' कम थी।
बड़ा हो गया हूँ मैं, दुनियादारी समझता हूँ,
पर सच कहूँ?
आज भी जब कोई बात बिगड़ती है,
तो जुबान पर सबसे पहला नाम तुम्हारा ही आता है।
कमरा तो भर गया है सामानों से,
पर वो कोना आज भी खाली है, जहाँ तुम बैठकर मेरा इंतज़ार करती थी।
मुझे तुमसे एक शिकायत है माँ...
तुम तो बिन कहे मेरा हर दर्द समझ जाती थी,
फिर उस दिन... मेरे "ना जाओ" कहने पर भी तुम रुकी क्यों नहीं?
इतनी भी क्या जल्दी थी तारों में खो जाने की?
सुनो ना...
अगर हो सके, तो आज रात सपने में आना,
कुछ मत कहना... बस मेरे सर पर एक बार हाथ फेर देना।
मुझे बहुत थकन हो गई है इस दुनिया से लड़ते-लड़ते,
मुझे फिर से तुम्हारी गोद में सोना है।
सिर्फ़ तुम्हारी,
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ये कैसा 'कोहरा' है जो अब छंटता नहीं,
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
तो... आ ही गए।
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमद...
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क्या चाहिए?
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सुनो शहर...
अब अपने इन ऊँचे मकानों की खिड़कियाँ बंद कर लो,
क्योंकि वह 'शायर',
जो तुम्हारी सड़कों पर लफ़्ज़ ढूंढता फिरता थ...
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