Nazm
मौत की राजधानी
21 views
December 17, 2025
ये कैसा 'कोहरा' है जो अब छंटता नहीं,
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेना भी अब तो, एक बगावत है।
सुनों ए तख्त पर बैठे हुए 'सियासत के खुदाओ',
जरा शीशे की खिड़कियों से, परदा तो हटाओ।
तुम्हारी फाइलों में सब 'हरा-भरा' और 'साफ' है,
मगर हकीकत में, हर साँस लेना यहाँ पाप है।
तुमने शहर को 'गैस का चैंबर' बना दिया,
तरक्की के नाम पर, फेफड़ों को धुआँ बना दिया।
हर साल आते हो, बस नए बहाने लेकर,
कभी पराली, कभी पड़ोसी, कभी दिवाली के जाने लेकर।
तुम्हारी मीटिंगों की चाय तो खत्म नहीं होती,
मगर यहाँ गरीबों की खाँसी कम नहीं होती।
बच्चे स्कूल जाते हैं चेहरे पे मास्क लगा कर,
और तुम खुश हो, अपनी रैलियों में भीड़ बुला कर?
ये जो धुंध है, ये कुदरत का कहर नहीं,
ये तुम्हारी नाकामियों का है, कोई शहर नहीं।
टैक्स तो पूरा लेते हो हमारी कमाई से,
फिर क्यों कतराते हो, साफ हवा की भरपाई से?
ये इमारतें, ये फ्लाईओवर, ये मेट्रो किस काम की?
जब ज़िंदगी ही न बचे, तो ये 'राजधानी' किस काम की?
जवाब दो हुक्मरानों, ये कैसा इंतज़ाम है?
क्या अब ज़हर बेचकर साँसें खरीदना, यही तुम्हारा काम है?
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेना भी अब तो, एक बगावत है।
सुनों ए तख्त पर बैठे हुए 'सियासत के खुदाओ',
जरा शीशे की खिड़कियों से, परदा तो हटाओ।
तुम्हारी फाइलों में सब 'हरा-भरा' और 'साफ' है,
मगर हकीकत में, हर साँस लेना यहाँ पाप है।
तुमने शहर को 'गैस का चैंबर' बना दिया,
तरक्की के नाम पर, फेफड़ों को धुआँ बना दिया।
हर साल आते हो, बस नए बहाने लेकर,
कभी पराली, कभी पड़ोसी, कभी दिवाली के जाने लेकर।
तुम्हारी मीटिंगों की चाय तो खत्म नहीं होती,
मगर यहाँ गरीबों की खाँसी कम नहीं होती।
बच्चे स्कूल जाते हैं चेहरे पे मास्क लगा कर,
और तुम खुश हो, अपनी रैलियों में भीड़ बुला कर?
ये जो धुंध है, ये कुदरत का कहर नहीं,
ये तुम्हारी नाकामियों का है, कोई शहर नहीं।
टैक्स तो पूरा लेते हो हमारी कमाई से,
फिर क्यों कतराते हो, साफ हवा की भरपाई से?
ये इमारतें, ये फ्लाईओवर, ये मेट्रो किस काम की?
जब ज़िंदगी ही न बचे, तो ये 'राजधानी' किस काम की?
जवाब दो हुक्मरानों, ये कैसा इंतज़ाम है?
क्या अब ज़हर बेचकर साँसें खरीदना, यही तुम्हारा काम है?