Nazm
माँ,
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December 12, 2025
इस छोटे से कमरे में, कैसी ये वीरानी छाई है माँ,
आज फिर इस काली रात में, तेरी बहुत याद आई है माँ।
बुख़ार से तप रहा है बदन, और पानी पूछने वाला कोई नहीं,
मेरे माथे पर तेरे ठंडे हाथ की, वो नरमी याद आई है माँ।
शहर की होटलों में, वो स्वाद कहाँ मिलता है,
मुझे तेरे हाथ की वो जली हुई रोटी भी, अमृत नज़र आई है माँ।
मैं कमाने तो निकला था घर से, बहुत से ख़्वाब लेकर,
मगर यहाँ तो हर एक चीज़, मुझे लगती पराई है माँ।
इस सख़्त तकिये पर सर रखकर, मुझे नींद नहीं आती,
आज फिर तेरी गोद में सर रखने की, ज़िद मन में समाई है माँ।
'ज़िगर शायर' ने दौलत तो बहुत जोड़ ली है इस शहर में,
मगर सच कहूँ... मैंने तुझे खोकर, बस ग़रीबी कमाई है माँ।
आज फिर इस काली रात में, तेरी बहुत याद आई है माँ।
बुख़ार से तप रहा है बदन, और पानी पूछने वाला कोई नहीं,
मेरे माथे पर तेरे ठंडे हाथ की, वो नरमी याद आई है माँ।
शहर की होटलों में, वो स्वाद कहाँ मिलता है,
मुझे तेरे हाथ की वो जली हुई रोटी भी, अमृत नज़र आई है माँ।
मैं कमाने तो निकला था घर से, बहुत से ख़्वाब लेकर,
मगर यहाँ तो हर एक चीज़, मुझे लगती पराई है माँ।
इस सख़्त तकिये पर सर रखकर, मुझे नींद नहीं आती,
आज फिर तेरी गोद में सर रखने की, ज़िद मन में समाई है माँ।
'ज़िगर शायर' ने दौलत तो बहुत जोड़ ली है इस शहर में,
मगर सच कहूँ... मैंने तुझे खोकर, बस ग़रीबी कमाई है माँ।
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सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
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तो... आ ही गए।
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमद...
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सुनो शहर...
अब अपने इन ऊँचे मकानों की खिड़कियाँ बंद कर लो,
क्योंकि वह 'शायर',
जो तुम्हारी सड़कों पर लफ़्ज़ ढूंढता फिरता थ...
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