Ghazal
भरोसा मर गया
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December 15, 2025
वो शख्स जो कभी जान था, दिल से उतर गया,
जब काम निकल गया, वो वादे से मुकर गया।
काँच की तरह सँभाल के रखा था रिश्ता हमने,
एक ठेस लगी और सब कुछ बिखर गया।
भीड़ में तो दिखता हूँ मैं हँसता हुआ मगर,
कोई नहीं जानता कि मेरे अंदर कौन मर गया।
बहुत गुरूर था मुझे अपनी मोहब्बत पर कभी,
आज वो भ्रम भी मेरी आँखों से गुज़र गया।
अब किससे शिकायत करें हम अपनी तबाही की,
वो तो 'वक़्त' था साहब, आया और गुज़र गया।
जब काम निकल गया, वो वादे से मुकर गया।
काँच की तरह सँभाल के रखा था रिश्ता हमने,
एक ठेस लगी और सब कुछ बिखर गया।
भीड़ में तो दिखता हूँ मैं हँसता हुआ मगर,
कोई नहीं जानता कि मेरे अंदर कौन मर गया।
बहुत गुरूर था मुझे अपनी मोहब्बत पर कभी,
आज वो भ्रम भी मेरी आँखों से गुज़र गया।
अब किससे शिकायत करें हम अपनी तबाही की,
वो तो 'वक़्त' था साहब, आया और गुज़र गया।
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