Nazm

भगोड़े भगवान

10 views January 1, 1970
जब मेहनत की रोटी कमाना इनके बस की बात न थी,
ज़िंदगी की धूप में तपना इनकी औकात न थी।
छोड़कर रणभूमि को, ये कायर फ़रार हो गए,
कपड़े रंगे गेरुआ, और 'धर्म के ठेकेदार' हो गए।

जो ख़ुद ज़िंदगी की जंग में लड़ नहीं पाए,
कंधों पर घर की ज़िम्मेदारी जड़ नहीं पाए।
वो हमको सिखाते हैं कि कैसे 'जीना' चाहिए,
विष का प्याला ग़रीब को ही पीना चाहिए।

कहते हैं— "पैसा तो हाथ का मैल है, छोड़ दो,"
"सांसारिक मोह-माया से अपना मुँह मोड़ दो।"
मगर ख़ुद ये 'नोटों' के बिस्तर पर ही सोते हैं,
इनके कुत्ते भी साहिब, AC में ही होते हैं।

डिग्रियाँ रद्दी हैं, और हुनर की क़दर नहीं,
बाबा बनने के लिए चाहिए कोई 'सफ़र' नहीं।
बस बातें बनाना और पाखंड रचना काम है,
भीड़ को लूटने का, सबसे आसान इंतज़ाम है।

असल में ये वो 'नकारा' हैं जो कुछ कर न सके,
सच्चाई के रास्ते पर दो क़दम भी चल न सके।
इसलिए 'भगवान' की आड़ में दुकान चला रहे हैं,
खुद की नाकामी को 'चमत्कार' बता रहे हैं।

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