Shayari

दिन ढला, दीप जला

10 views December 12, 2025
दिन का सफ़र सिमट कर अब ढल रहा है,
घर के अँधेरे कोने में इक दीप जल रहा है।
रिश्तों पे जम गई थी जो बर्फ़ पिछली शब,
देखो, चिराग़ की गर्मी से वो भी पिघल रहा है।

बाहर का शोरगुल तो बस कुछ पलों का मेहमान,
एक मौन सा दिया है, जो भीतर जल रहा है।

हैरत से देखता है अँधेरा झुका के सर,
एक नन्हा सा दिया तूफ़ानों में पल रहा है।

लगता है आसमाँ को ज़मीं से इश्क़ हुआ,
हर एक सितारा आज भेस बदल रहा है।

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जो किए ही नहीं कभी मैंने
वो भी वादे निभा रहा हूँ मैं
मुझसे फिर बात कर रही है वो
फिर से बातों में आ रहा हूँ मैं
काँच का तोहफा न देना कभी, रूठ कर लोग 'तोड़' दिया करते हैं,
जो बहुत अच्छे हों, उन्हें अक्सर लोग 'छोड़' दिया करते हैं।
मुझे तेरा साथ ज़िन्दगी भर नहीं चाहिए,
बल्कि जब तक तू साथ है, तब तक ज़िन्दगी चाहिए।