Ghazal
तुम क्या चाहती हो?
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December 12, 2025
तुम अपने ज़हन में, कितनी बात छुपाती हो,
खामोश रह कर भी, न जाने क्या-क्या बताती हो।
मेरे अहसास को तोलकर, मेरे लिए नई दुनिया सजाती हो,
मगर लबों से हक़ीक़त, कहने से कतराती हो।
आँखों में तो समंदर भर रखा है इश्क़ का तुमने,
फिर होठों पे ये ताले, किसलिए लगाती हो?
सब कुछ तो लुटा दिया तुमने मेरी एक खुशी के लिए,
फिर भी ये राज़, क्यों दिल में दबाती हो?
मैं पढ़ लेता हूँ तुम्हारी धड़कनों की हर एक साज़िश,
बेवजह मुझसे अपनी नज़रें, क्यों चुराती हो?
ज़िगर शायर उलझा हुआ है तुम्हारी इन पहेलियों में,
तुम बताती क्यों नहीं, कि तुम मुझसे क्या चाहती हो?
खामोश रह कर भी, न जाने क्या-क्या बताती हो।
मेरे अहसास को तोलकर, मेरे लिए नई दुनिया सजाती हो,
मगर लबों से हक़ीक़त, कहने से कतराती हो।
आँखों में तो समंदर भर रखा है इश्क़ का तुमने,
फिर होठों पे ये ताले, किसलिए लगाती हो?
सब कुछ तो लुटा दिया तुमने मेरी एक खुशी के लिए,
फिर भी ये राज़, क्यों दिल में दबाती हो?
मैं पढ़ लेता हूँ तुम्हारी धड़कनों की हर एक साज़िश,
बेवजह मुझसे अपनी नज़रें, क्यों चुराती हो?
ज़िगर शायर उलझा हुआ है तुम्हारी इन पहेलियों में,
तुम बताती क्यों नहीं, कि तुम मुझसे क्या चाहती हो?
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