Shayari
ढूंढता हूँ
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December 12, 2025
इस ज़िन्दगी के सफ़र में अपना निशान ढूंढता हूँ
मैं भीड़ में खो गया हूँ, एक इंसान ढूंढता हूँ
ज़मीन की तल्ख़ियों से दिल बहुत घबरा गया है
परिंदों की तरह अब खुला आसमान ढूंढता हूँ
यहाँ हर शख़्स की क़ीमत लगी है बाज़ार में
मैं इन सौदागरों की बस्ती में ईमान ढूंढता हूँ
दौलत, शोहरत, ये महल, सब कुछ बे-मायने है
मैं तो बस दो घड़ी का सुकून-ए-जान ढूंढता हूँ
मैं भीड़ में खो गया हूँ, एक इंसान ढूंढता हूँ
ज़मीन की तल्ख़ियों से दिल बहुत घबरा गया है
परिंदों की तरह अब खुला आसमान ढूंढता हूँ
यहाँ हर शख़्स की क़ीमत लगी है बाज़ार में
मैं इन सौदागरों की बस्ती में ईमान ढूंढता हूँ
दौलत, शोहरत, ये महल, सब कुछ बे-मायने है
मैं तो बस दो घड़ी का सुकून-ए-जान ढूंढता हूँ
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जो किए ही नहीं कभी मैंने
वो भी वादे निभा रहा हूँ मैं
मुझसे फिर बात कर रही है वो
फिर से बातों में आ रहा हूँ मैं
वो भी वादे निभा रहा हूँ मैं
मुझसे फिर बात कर रही है वो
फिर से बातों में आ रहा हूँ मैं
काँच का तोहफा न देना कभी, रूठ कर लोग 'तोड़' दिया करते हैं,
जो बहुत अच्छे हों, उन्हें अक्सर लोग 'छोड़' दिया करते हैं।
जो बहुत अच्छे हों, उन्हें अक्सर लोग 'छोड़' दिया करते हैं।
मुझे तेरा साथ ज़िन्दगी भर नहीं चाहिए,
बल्कि जब तक तू साथ है, तब तक ज़िन्दगी चाहिए।
बल्कि जब तक तू साथ है, तब तक ज़िन्दगी चाहिए।