Ghazal
ठिकाना
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December 12, 2025
ये क़ब्रिस्तान ही मेरा ठिकाना है मेरा,
यही सुनसान वीराना है मेरा।
वो खोपड़ी जो पड़ी है, वो दोस्त है मेरी,
ये सारा मुर्दा ज़माना है मेरा।
मैं रूह से बातें करता हूँ रात भर,
ये सिलसिला बड़ा पुराना है मेरा।
चिताओं की आग ही बिस्तर है मेरा,
यही जलना-बुझना फ़साना है मेरा।
यही सुनसान वीराना है मेरा।
वो खोपड़ी जो पड़ी है, वो दोस्त है मेरी,
ये सारा मुर्दा ज़माना है मेरा।
मैं रूह से बातें करता हूँ रात भर,
ये सिलसिला बड़ा पुराना है मेरा।
चिताओं की आग ही बिस्तर है मेरा,
यही जलना-बुझना फ़साना है मेरा।
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