Ghazal
ज़मीर का आईना
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December 12, 2025
"माफ़ी कीजिये", कह कर वो बड़ी सादगी से मुस्कुराये,
जैसे खंजर छुपा रखा हो अपनी आस्तीन के ठिकाने में।
उजाड़ कर किसी का जहाँ, वो जश्न मनाते हैं,
कहते हैं, "ज़िंदा हूँ मैं", बड़े फख्र से ज़माने में।
अपने गुनाहों का ठीकरा गैरों पे फोड़ कर,
वो मशगूल हैं अपने किरदार को पाक बताने में।
बड़ी सफाई से धोते हैं लहू अपने हाथ का,
इन्हें महारत हासिल है सबूतों को मिटाने में।
वो भूल जाते हैं शायद, कि वक़्त सब देखता है,
देर नहीं लगती 'मैं' को 'ख़ाक' में मिल जाने में।
जैसे खंजर छुपा रखा हो अपनी आस्तीन के ठिकाने में।
उजाड़ कर किसी का जहाँ, वो जश्न मनाते हैं,
कहते हैं, "ज़िंदा हूँ मैं", बड़े फख्र से ज़माने में।
अपने गुनाहों का ठीकरा गैरों पे फोड़ कर,
वो मशगूल हैं अपने किरदार को पाक बताने में।
बड़ी सफाई से धोते हैं लहू अपने हाथ का,
इन्हें महारत हासिल है सबूतों को मिटाने में।
वो भूल जाते हैं शायद, कि वक़्त सब देखता है,
देर नहीं लगती 'मैं' को 'ख़ाक' में मिल जाने में।
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ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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