Ghazal
चिता
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December 12, 2025
मुझे शमशानों की राख ने बनाया है,
मेरे अलफ़ाज़ को मुर्दों ने ही सिखाया है।
वो दूध जो तुम ज़िंदों को नसीब न होगा,
वो मुर्दों ने मुझे बचपन में पिलाया है।
बदन को सर्दी मिटाने की क्या ज़रूरत है,
जली हड्डियों की गर्मी ने मुझे जलाया है।
गिराने आया था वो, क्या ग़ज़ब तमाशा था,
मुझे तो मुर्दों के हाथों ने ही उठाया है।
मैं नींद कैसे लूँ मख़मल के बिस्तरों पे यहाँ,
चिता की आग को मैंने बिछौना बनाया है।
वो जिन खोपड़ियों से डर गया ज़माना सारा,
उन्हीं को घर में सजाकर ये दिल लगाया है।
मेरे अलफ़ाज़ को मुर्दों ने ही सिखाया है।
वो दूध जो तुम ज़िंदों को नसीब न होगा,
वो मुर्दों ने मुझे बचपन में पिलाया है।
बदन को सर्दी मिटाने की क्या ज़रूरत है,
जली हड्डियों की गर्मी ने मुझे जलाया है।
गिराने आया था वो, क्या ग़ज़ब तमाशा था,
मुझे तो मुर्दों के हाथों ने ही उठाया है।
मैं नींद कैसे लूँ मख़मल के बिस्तरों पे यहाँ,
चिता की आग को मैंने बिछौना बनाया है।
वो जिन खोपड़ियों से डर गया ज़माना सारा,
उन्हीं को घर में सजाकर ये दिल लगाया है।
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