Ghazal
गाँव का तहख़ाना
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December 12, 2025
उम्र गुज़र जाएगी मेरी इस शहर के ज़माने में,
फिर लौटकर जाऊँगा मैं, फिर उसी मेरे गाँव के तहख़ाने में।
यहाँ की रौनक़ें सब ख़्वाब हैं, सब खोखले से हैं,
वो जो 'सच' है, वो रखा है उसी पुराने में।
जहाँ जमा है मेरी बचपन की यादें,
सुकूँ मिलेगा उसी 'दौर' को फिर से पाने में।
वो छोटी-छोटी ख़ुशी, वो बेफ़िक्री का आलम,
जो छोड़ आया था मैं, एक 'शहर' कमाने में।
कहा है आपने: "उनको फिर से बुढ़ापे में सजाऊँगा",
इक उम्र लगती है 'बच्चों' को 'फिर' से बच्चा हो जाने में।
फिर लौटकर जाऊँगा मैं, फिर उसी मेरे गाँव के तहख़ाने में।
यहाँ की रौनक़ें सब ख़्वाब हैं, सब खोखले से हैं,
वो जो 'सच' है, वो रखा है उसी पुराने में।
जहाँ जमा है मेरी बचपन की यादें,
सुकूँ मिलेगा उसी 'दौर' को फिर से पाने में।
वो छोटी-छोटी ख़ुशी, वो बेफ़िक्री का आलम,
जो छोड़ आया था मैं, एक 'शहर' कमाने में।
कहा है आपने: "उनको फिर से बुढ़ापे में सजाऊँगा",
इक उम्र लगती है 'बच्चों' को 'फिर' से बच्चा हो जाने में।
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मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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