Ghazal
गवारा नहीं
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January 1, 1970
भीख में मिली इज़्ज़त हमें गवारा नहीं,
हम वो हैं जिन्हें किसी का सहारा नहीं।
जो एक बार मेरी नज़रों से गिर गया,
फिर उस शख्स को हम देखते दोबारा नहीं।
मेरी कश्ती को डराने की कोशिश मत करना,
मैं वो समंदर हूँ जिसे तलाश-ए-किनारा नहीं।
हम अपनी शर्तों पे जीते हैं ज़िंदगी अपनी,
किसी के कहने से तो साँस लेना भी गवारा नहीं।
दुश्मनी लाख करो मगर सामने आ कर,
शेर कभी करते पीठ पीछे इशारा नहीं।
हम वो हैं जिन्हें किसी का सहारा नहीं।
जो एक बार मेरी नज़रों से गिर गया,
फिर उस शख्स को हम देखते दोबारा नहीं।
मेरी कश्ती को डराने की कोशिश मत करना,
मैं वो समंदर हूँ जिसे तलाश-ए-किनारा नहीं।
हम अपनी शर्तों पे जीते हैं ज़िंदगी अपनी,
किसी के कहने से तो साँस लेना भी गवारा नहीं।
दुश्मनी लाख करो मगर सामने आ कर,
शेर कभी करते पीठ पीछे इशारा नहीं।
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