Ghazal
गुलामी नहीं करते
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January 1, 1970
ये सर बस 'खुदा' के आगे झुकता है, हम किसी को सलाम नहीं करते,
हम बादशाह हैं अपनी मर्जी के, किसी की गुलामी नहीं करते।
मेरी इज़्ज़त ही मेरा गहना है, इसे सँभाल के रखता हूँ,
हम अपनी खुद्दारी को भरे बाज़ार में नीलाम नहीं करते।
जो शख्स मेरी नज़रों से एक बार गिर जाए,
फिर उस शख्स से हम दोबारा कलाम नहीं करते।
शेर हमेशा सामने से वार करता है दुश्मनों पर,
हवा में साज़िशों का हम कोई काम नहीं करते।
हमसे उलझना है तो अपनी 'औकात' देखकर आना,
हम छोटे-मोटे लोगों को कभी बदनाम नहीं करते।
हम बादशाह हैं अपनी मर्जी के, किसी की गुलामी नहीं करते।
मेरी इज़्ज़त ही मेरा गहना है, इसे सँभाल के रखता हूँ,
हम अपनी खुद्दारी को भरे बाज़ार में नीलाम नहीं करते।
जो शख्स मेरी नज़रों से एक बार गिर जाए,
फिर उस शख्स से हम दोबारा कलाम नहीं करते।
शेर हमेशा सामने से वार करता है दुश्मनों पर,
हवा में साज़िशों का हम कोई काम नहीं करते।
हमसे उलझना है तो अपनी 'औकात' देखकर आना,
हम छोटे-मोटे लोगों को कभी बदनाम नहीं करते।
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