Ghazal
कलाकार का गाँव
11 views
December 12, 2025
ख़याल में एक गाँव पहले बना दिया,
फिर अपने हाथ से उसको वहीं जला दिया।
वो जलता रहा और मैं हाथ सेंकता रहा,
उसी की आग को मैंने ही और हवा दिया।
बड़े ही शौक़ से रंग भरे थे कल जिसमें,
हर एक घर को बड़े नाज़ से सजा दिया।
ये मेरा हक़ था, कि वो मेरी ही मिल्कियत (property) थी,
जिसे बनाया था मैंने, उसे मिटा दिया।
मुझे पसंद नहीं 'अंत' कोई और लिखे,
सो अपनी चीज़ का अंजाम ख़ुद लिखा दिया।
फिर अपने हाथ से उसको वहीं जला दिया।
वो जलता रहा और मैं हाथ सेंकता रहा,
उसी की आग को मैंने ही और हवा दिया।
बड़े ही शौक़ से रंग भरे थे कल जिसमें,
हर एक घर को बड़े नाज़ से सजा दिया।
ये मेरा हक़ था, कि वो मेरी ही मिल्कियत (property) थी,
जिसे बनाया था मैंने, उसे मिटा दिया।
मुझे पसंद नहीं 'अंत' कोई और लिखे,
सो अपनी चीज़ का अंजाम ख़ुद लिखा दिया।
Share This Poem
More from Ghazal
हुनर लफ़्ज़ों का बाज़ार में बिक सकता है बेशक,
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
लफ़्ज़ों को जोड़ना तो बस एक हुनर है दुनिया का,
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
मेरे दिल में गूँजता हुआ, एक सवाल हो तुम,
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...