Ghazal
औकात दिखा दी
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January 1, 1970
जो लोग मेरी इज़्ज़त के काबिल नहीं थे,
उन्हें हमने अपनी नज़रों से गिरा दिया।
बहुत शौक था उन्हें हमारे जज़्बातों से खेलने का,
हमने बाज़ी ही पलट दी और उन्हें हरा दिया।
जो समझते थे खुद को बादशाह मेरी दुनिया का,
वक़्त आने पर उन्हें 'आईना' दिखा दिया।
अब कोई फर्क नहीं पड़ता किसी के रूठ जाने से,
हमने दिल से हर झूठी उम्मीद को मिटा दिया।
वो चाहते थे कि हम बिखर जाएँ टूट कर,
हमने हँस कर उनका ये वहम भी जला दिया।
उन्हें हमने अपनी नज़रों से गिरा दिया।
बहुत शौक था उन्हें हमारे जज़्बातों से खेलने का,
हमने बाज़ी ही पलट दी और उन्हें हरा दिया।
जो समझते थे खुद को बादशाह मेरी दुनिया का,
वक़्त आने पर उन्हें 'आईना' दिखा दिया।
अब कोई फर्क नहीं पड़ता किसी के रूठ जाने से,
हमने दिल से हर झूठी उम्मीद को मिटा दिया।
वो चाहते थे कि हम बिखर जाएँ टूट कर,
हमने हँस कर उनका ये वहम भी जला दिया।
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हुनर लफ़्ज़ों का बाज़ार में बिक सकता है बेशक,
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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लफ़्ज़ों को जोड़ना तो बस एक हुनर है दुनिया का,
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
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मेरे दिल में गूँजता हुआ, एक सवाल हो तुम,
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...
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कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...