Nazm
अब आए हो?
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December 12, 2025
तो... आ ही गए।
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमदर्दी? या बस मेरे जले हुए ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने का नया तरीका ढूँढ लाए हो?
अरे, घबराओ मत। बैठो।
देखो, ये वही जिस्म है जिसे तुमने नोचा था, फाड़ा था, रौंदा था।
आज सोने का लिबास पहन लिया तो पाक हो गया क्या?
तुम्हारी दी हुई हर चोट, हर गाली, हर ज़िल्लत...
मैंने उसे फेंका नहीं।
मैंने उन सबकी ईंटें बनाईं और ये कामयाबी का महल खड़ा किया है।
इसकी हर दीवार पर तुम्हारे नाम लिखे हैं, बस तुम्हें दिखेंगे नहीं।
कहते हो, "हम तुम्हारे अपने हैं।"
वाह! क्या ख़ूबसूरत मज़ाक है।
जब मैं सड़कों पर अपनी रूह का जनाज़ा लेकर घूम रहा था, तब कहाँ थे तुम "अपने"?
जब मेरी हड्डियाँ तोड़ी जा रही थीं और आवाज़ घोंटी जा रही थी, तब तुम्हारा रिश्ता कहाँ सो रहा था?
मेरे अपने?
मेरे अपने तो वो कीड़े थे जो मेरे मरने का इंतज़ार कर रहे थे ताकि मेरी लाश खा सकें।
ये जो अकड़ देख रहे हो ना मेरी आँखों में, ये दौलत की नहीं है।
ये उस ज़हर की है जो तुमने मुझे पिलाया था, और मैं उसे पीकर भी ज़िंदा बच गया।
मैं झुका नहीं, क्योंकि मेरी टूटी हुई हड्डियों ने मुझे सीधा खड़ा रहना सिखाया है।
मैं मरा नहीं, क्योंकि मुझे तुम सबको अपनी मौत का तमाशा देखने के लिए ज़िंदा रहना था।
अब मुझे किसी की ज़रूरत नहीं।
मेरा अकेलापन मेरी सल्तनत है, मेरा गुरूर मेरा ताज।
और इस सल्तनत में तुम जैसे भिखारियों की कोई जगह नहीं।
तो अब जाओ, और अपनी शराफ़त का नक़ाब किसी और को पहनाना।
यहाँ सिर्फ़ मेरा राज चलेगा। मेरे ज़ख़्मों का, मेरी नफ़रत का, और मेरी इस कभी न ख़त्म होने वाली लड़ाई का।
जाओ!
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमदर्दी? या बस मेरे जले हुए ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने का नया तरीका ढूँढ लाए हो?
अरे, घबराओ मत। बैठो।
देखो, ये वही जिस्म है जिसे तुमने नोचा था, फाड़ा था, रौंदा था।
आज सोने का लिबास पहन लिया तो पाक हो गया क्या?
तुम्हारी दी हुई हर चोट, हर गाली, हर ज़िल्लत...
मैंने उसे फेंका नहीं।
मैंने उन सबकी ईंटें बनाईं और ये कामयाबी का महल खड़ा किया है।
इसकी हर दीवार पर तुम्हारे नाम लिखे हैं, बस तुम्हें दिखेंगे नहीं।
कहते हो, "हम तुम्हारे अपने हैं।"
वाह! क्या ख़ूबसूरत मज़ाक है।
जब मैं सड़कों पर अपनी रूह का जनाज़ा लेकर घूम रहा था, तब कहाँ थे तुम "अपने"?
जब मेरी हड्डियाँ तोड़ी जा रही थीं और आवाज़ घोंटी जा रही थी, तब तुम्हारा रिश्ता कहाँ सो रहा था?
मेरे अपने?
मेरे अपने तो वो कीड़े थे जो मेरे मरने का इंतज़ार कर रहे थे ताकि मेरी लाश खा सकें।
ये जो अकड़ देख रहे हो ना मेरी आँखों में, ये दौलत की नहीं है।
ये उस ज़हर की है जो तुमने मुझे पिलाया था, और मैं उसे पीकर भी ज़िंदा बच गया।
मैं झुका नहीं, क्योंकि मेरी टूटी हुई हड्डियों ने मुझे सीधा खड़ा रहना सिखाया है।
मैं मरा नहीं, क्योंकि मुझे तुम सबको अपनी मौत का तमाशा देखने के लिए ज़िंदा रहना था।
अब मुझे किसी की ज़रूरत नहीं।
मेरा अकेलापन मेरी सल्तनत है, मेरा गुरूर मेरा ताज।
और इस सल्तनत में तुम जैसे भिखारियों की कोई जगह नहीं।
तो अब जाओ, और अपनी शराफ़त का नक़ाब किसी और को पहनाना।
यहाँ सिर्फ़ मेरा राज चलेगा। मेरे ज़ख़्मों का, मेरी नफ़रत का, और मेरी इस कभी न ख़त्म होने वाली लड़ाई का।
जाओ!
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ये कैसा 'कोहरा' है जो अब छंटता नहीं,
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
सुनो शहर...
अब अपने इन ऊँचे मकानों की खिड़कियाँ बंद कर लो,
क्योंकि वह 'शायर',
जो तुम्हारी सड़कों पर लफ़्ज़ ढूंढता फिरता थ...
अब अपने इन ऊँचे मकानों की खिड़कियाँ बंद कर लो,
क्योंकि वह 'शायर',
जो तुम्हारी सड़कों पर लफ़्ज़ ढूंढता फिरता थ...